महिलाओं की भागीदारी में पाकिस्तान सबसे निचले पायदान पर: प्रबंधन पदों पर 8 प्रतिशत से भी कम महिलाएं

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नई दिल्ली। कार्यस्थलों पर लैंगिक प्रतिनिधित्व के मामले में पाकिस्तान दुनिया के सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल हो गया है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आंकड़ों के हवाले से आई एक रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में वरिष्ठ और मध्य प्रबंधन पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 8 प्रतिशत से भी कम है।

यह आंकड़ा पाकिस्तान को अफगानिस्तान और यमन जैसे देशों के साथ वैश्विक रैंकिंग में सबसे नीचे रखता है, जबकि दुनिया भर में प्रबंधन पदों पर महिलाओं की औसत हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत है। यह जानकारी पाकिस्तान के अखबार डॉन की रिपोर्ट में दी गई है।

रिपोर्ट में पाकिस्तान की तुलना अन्य मुस्लिम-बहुल देशों से भी की गई है, जहां स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। ब्रुनेई में प्रबंधन पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी 32 प्रतिशत से अधिक है, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में यह 23.5 प्रतिशत, ट्यूनीशिया में 26 प्रतिशत और तुर्किये में 19.1 प्रतिशत दर्ज की गई है।

रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में कार्यस्थलों पर महिलाओं की मौजूदगी तो बढ़ी है, लेकिन उनकी वास्तविक सत्ता और निर्णय लेने की भूमिका अब भी सीमित बनी हुई है।

विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान के कार्यस्थलों पर महिलाओं के प्रति भेदभाव कई रूपों में दिखाई देता है। पारंपरिक माहौल में यह भेदभाव खुलकर सामने आता है, जहां महिलाओं से कहा जाता है कि कुछ नौकरियां उनके लिए नहीं हैं या उनका मुख्य दायित्व घर तक ही सीमित होना चाहिए।

वहीं, आधुनिक और कॉर्पोरेट माहौल में यह भेदभाव अधिक सूक्ष्म और ‘प्रगतिशील’ भाषा में छिपा होता है। महिला दिवस जैसे आयोजनों में महिलाओं को समावेशन का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता है, लेकिन उन्हें वास्तविक शक्ति या रणनीतिक फैसलों में शामिल करने से कतराया जाता है।

कई दफ्तरों में सतह पर लैंगिक समानता दिखती है, लेकिन समय के साथ ऐसे पैटर्न सामने आते हैं, जहां महिलाओं से लगातार मीटिंग के नोट्स लेने, समन्वय करने या फॉलो-अप जैसे काम कराए जाते हैं, चाहे उनका पद कुछ भी हो। यह बिना वेतन और बिना मान्यता वाला “ऑफिस हाउसवर्क” अक्सर पुरुषों को नहीं सौंपा जाता, जिससे महिलाएं नेतृत्वकर्ता के बजाय सहायक भूमिका में सिमट जाती हैं।

इसके अलावा, महिलाओं द्वारा दिए गए पेशेवर सुझावों को भी अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता। वही सुझाव जब बाद में किसी पुरुष सहकर्मी द्वारा दोहराए जाते हैं, तो उनकी सराहना होती है। यह प्रवृत्ति महिलाओं को श्रेय से वंचित करती है और यह धारणा मजबूत करती है कि अधिकार और नेतृत्व पुरुषों की आवाज़ से ही जुड़ा है।

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