अल्पकालिक स्थिरता, लेकिन विकास नहीं; पाकिस्तान ‘फेलिंग स्टेट’ की ओर

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नई दिल्ली। मैक्रोइकोनॉमिक स्थिरता और सुधारों के संकेतों के बावजूद निरंतर आर्थिक विकास के अभाव ने पाकिस्तान को ‘फेलिंग स्टेट’ की स्थिति में ला खड़ा किया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, वास्तविक आय में गिरावट के कारण सामाजिक हालात बिगड़ रहे हैं, जो सतही आर्थिक सुधारों के बिल्कुल उलट तस्वीर पेश करते हैं।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने हाउसहोल्ड इंटीग्रेटेड इकोनॉमिक सर्वे के आंकड़ों के हवाले से बताया कि बेहतर दिखने वाले प्रमुख आर्थिक संकेतकों के साथ सामाजिक परिणामों में गिरावट का स्पष्ट विरोधाभास नजर आता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, हाल के वर्षों में वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर औसतन केवल 2.47 प्रतिशत रही, जो लगभग 2.55 प्रतिशत की जनसंख्या वृद्धि दर के बराबर ही है। इसका मतलब यह है कि प्रति व्यक्ति उत्पादन में व्यावहारिक रूप से कोई बढ़ोतरी नहीं हुई।

आर्थिक वृद्धि दर 2019–20 में संकुचन से 2021–22 में 5.97 प्रतिशत के शिखर तक पहुंची, लेकिन इसके बाद के वर्षों में फिर से घटकर मध्यम एकल अंक तक सिमट गई।

हालांकि 2018 के बाद से घरेलू नाममात्र आय लगभग दोगुनी हो गई है, लेकिन पिछले 50 वर्षों की सबसे ऊंची महंगाई ने अधिकांश परिवारों की क्रय शक्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरी इलाकों में आय असमानता अधिक स्पष्ट है। अमीर परिवारों की औसत आय 1,46,920 रुपये से अधिक है, जबकि सबसे गरीब परिवारों की आय 42,412 रुपये से भी कम है। 2018–19 के बाद शीर्ष आय वर्ग (पांचवां क्विंटाइल) की आय में 119.25 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि निचले आय वर्ग (पहला क्विंटाइल) में यह वृद्धि केवल 80.45 प्रतिशत रही, जिससे यह साफ होता है कि अधिक आय वाले वर्गों को अपेक्षाकृत ज्यादा लाभ मिला।

पिछले एक दशक में पाकिस्तान ने फिर से मांग-आधारित आर्थिक रणनीति अपनाई और चीनी निवेश को ‘गेम चेंजर’ के रूप में पेश किया, लेकिन यह मॉडल अपेक्षित परिणाम देने में असफल रहा।

रिपोर्ट के अनुसार, इसके विपरीत, आपूर्ति-आधारित अर्थशास्त्र यह मानता है कि दीर्घकालिक और टिकाऊ आर्थिक विकास के लिए कर दरों में कमी, व्यापार करने में आसानी, सरकारी खर्च में कटौती, सुदृढ़ मौद्रिक नीति, मुक्त व्यापार और निजीकरण आवश्यक हैं।

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि पाकिस्तान एक सुसंगत आपूर्ति-आधारित आर्थिक नीति नहीं अपनाता, तो वह अल्पकालिक स्थिरता के ऐसे ही चक्रों में फंसा रहेगा, जिनसे न तो उत्पादकता बढ़ेगी और न ही समृद्धि आएगी।

एक अन्य हालिया रिपोर्ट में भी कहा गया है कि पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक स्थिति का एक बड़ा कारण शिक्षा और कौशल प्रणाली की विफलता है, जो मानव क्षमता को उत्पादकता में बदलने में नाकाम रही है।

रिपोर्ट के अनुसार, शिक्षा पर कम सार्वजनिक खर्च, पुराने पाठ्यक्रम, शिक्षकों का अपर्याप्त प्रशिक्षण, सीमित व्यावसायिक शिक्षा के विकल्प और अनुसंधान के लिए अपर्याप्त फंडिंग के चलते कौशल की कमी बनी हुई है और युवाओं में बेरोजगारी लगातार ऊंची बनी हुई है।

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