नई दिल्ली। आरबीआई के कड़े फैसलों से रुपये में जोरदार उछाल देखने को मिला है। सोमवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 93 पैसे की बड़ी बढ़त बनाकर 95.78 के स्तर पर बंद हुआ। बीते छह महीनों से भी अधिक समय में रुपये की यह एक दिन में सबसे बड़ी मजबूती मानी जा रही है। इससे पहले 2 अप्रैल को रुपये में 166 पैसे का एकदिवसीय उछाल आया था।
विदेशी मुद्रा विशेषज्ञों के अनुसार, आरबीआई के इस हस्तक्षेप ने हाजिर बाजार (स्पॉट मार्केट) में डॉलर की अचानक मांग को तो नियंत्रित किया है, लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड इसी तरह $105 प्रति बैरल के पार बना रहता है, तो भारत के आयात बिल पर दबाव बना रहेगा। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर डॉलर की मांग बढ़ाती हैं, जिससे रुपये पर फिर से दबाव आ सकता है।
इसके साथ ही, भारतीय शेयर बाजार से विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की लगातार निकासी भी एक बड़ी चिंता का विषय है। सोमवार को हुई ₹1,708 करोड़ से अधिक की शुद्ध बिकवाली यह दर्शाती है कि विदेशी निवेशक फिलहाल सतर्क रुख अपना रहे हैं। जब FIIs बाजार से पैसा निकालते हैं, तो वे भारतीय रुपये को डॉलर में बदलकर वापस ले जाते हैं, जिससे घरेलू मुद्रा कमजोर होती है।
दूसरी ओर, देश का विदेशी मुद्रा भंडार भी लगातार दो हफ्तों में करीब $31.29 अरब घट चुका है (25 सितंबर को $18.34 अरब और 2 अक्टूबर को $12.95 अरब की कमी)। हालांकि $734.60 अरब का कुल भंडार अभी भी काफी मजबूत स्थिति में है और केंद्रीय बैंक को बाजार में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त दायरा देता है, लेकिन इस गिरावट की रफ्तार पर लगाम लगाना आरबीआई के लिए एक मुख्य चुनौती होगा।
संक्षेप में कहें तो, आरबीआई के सख्त मौद्रिक फैसलों ने सट्टेबाजों को पीछे हटने पर मजबूर कर रुपये को तात्कालिक सहारा तो दे दिया है, लेकिन लंबी अवधि में रुपये का स्थायित्व इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चे तेल की दरें कब शांत होती हैं और FIIs की बिकवाली का दौर कब थमता है।

