उज्जैन। मध्य प्रदेश के धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र उज्जैन में विजयादशमी के पावन पर्व से ठीक पहले रावण दहन की परंपरा को लेकर एक अनूठा और गरमाया हुआ विवाद खड़ा हो गया है। अखिल भारतीय पुजारी महासंघ की ओर से शहर की चार प्रमुख दशहरा उत्सव समितियों के संयोजकों को एक एडवोकेट के माध्यम से आधिकारिक कानूनी नोटिस भेजा गया है। इस नोटिस में आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि पर रावण दहन किए जाने की परंपरा पर गहरी आपत्ति जताई गई है और समितियों से धार्मिक ग्रंथों के तर्कों व प्रमाणों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करने की मांग की गई है। यदि सात दिनों के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो इस मामले में आगे कानूनी कदम उठाने की चेतावनी भी दी गई है।
लाल ओम अमरनाथ खत्री दशहरा उत्सव समिति (संयोजक: शिव खत्री), कार्तिक मेला दशहरा उत्सव समिति (संयोजक: चेतन यादव), सिद्धवट दशहरा समिति (संयोजक: राघवेंद्र चतुर्वेदी), शास्त्री नगर दशहरा उत्सव समिति (संयोजक: विजय सिंह दरबार)
अखिल भारतीय पुजारी महासंघ का दावा है कि वाल्मीकि रामायण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण जैसे प्राचीन सनातन ग्रंथों के अध्ययन से भगवान श्रीराम के जीवन की घटनाओं का जो क्रम सामने आता है, उसके अनुसार रावण का वध आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी (यानी मौजूदा दशहरा) को नहीं हुआ था। उनके अनुसार, यह घटनाक्रम चैत्र कृष्ण पक्ष की चतुर्थी के आसपास बैठता है।
नोटिस में राम जन्म, सीता हरण, हनुमान जी की लंका यात्रा, समुद्र पर सेतु निर्माण और राम-रावण युद्ध के कालक्रम का हवाला दिया गया है।
नोटिस में इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि रावण ने अपने कुल, प्रजा और परिवार के उद्धार के उद्देश्य से भगवान श्रीराम से विरोध (वैर) मोल लिया था। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के एक श्लोक का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया है कि श्रीराम के हाथों मृत्यु को सामान्य रूप से केवल नकारात्मक या असत्य की हार के रूप में नहीं, बल्कि प्रभु के हाथों मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति के रूप में देखा जाना चाहिए।
महासंघ का कहना है कि दशहरे के दिन रावण के पुतले दहन से पहले और बाद में जिस प्रकार भारी आतिशबाजी की जाती है और इसे ‘असत्य पर सत्य की विजय’ के प्रतीक के रूप में दिखाया जाता है, उसकी धार्मिक प्रामाणिकता और तिथिगत शुद्धता गंभीर रूप से जांच का विषय है।

