भोपाल। मध्य प्रदेश की राजनीति में दलबदल कर दोबारा कांग्रेस का दामन थामने की चाह रखने वाले नेताओं के लिए डगर अब आसान नहीं होगी। प्रदेश कांग्रेस ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि पार्टी छोड़कर बीजेपी में जाने वाले और अब वापसी की जुगत लगा रहे नेताओं को अब एक कड़े सियासी इम्तिहान से गुजरना होगा। बिना स्थानीय संगठन की हरी झंडी के पार्टी में किसी भी बाहरी या पुराने बागी नेता की सीधी एंट्री पर रोक लगा दी गई है, जिससे दोबारा अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे नेताओं की मुश्किलें काफी बढ़ सकती हैं।
नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, जो भी नेता बीजेपी छोड़कर वापस कांग्रेस में आना चाहते हैं, उनके आवेदन सबसे पहले संबंधित जिले की ‘जिला समन्वय समिति’ के समक्ष रखे जाएंगे। यह समिति उन तमाम पहलुओं की बारीकी से जांच करेगी कि संबंधित नेता ने किन परिस्थितियों में पार्टी छोड़ी थी और अब उनकी वापसी के पीछे असली वजहें क्या हैं।
जिला स्तर पर नेता के राजनीतिक इतिहास और क्षेत्र के कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया का आंकलन किया जाएगा। यदि समिति सर्वसम्मति से प्रस्ताव को हरी झंडी देती है, तभी मामला आगे की मंजूरी के लिए प्रदेश मुख्यालय (भोपाल) भेजा जाएगा। अगर स्थानीय समिति स्तर पर ही किसी तरह की आपत्ति दर्ज की जाती है, तो नेता की घर वापसी का रास्ता लगभग बंद हो जाएगा।
इस पूरी रणनीति पर बात करते हुए जबलपुर कांग्रेस नगर अध्यक्ष शौरभ ‘नाटी’ शर्मा ने भी स्पष्ट किया है कि पार्टी अब हर एक पहलू का गहराई से विश्लेषण कर रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल उन नेताओं को ही मौका मिले जो संगठन के प्रति निष्ठावान रहें।
कांग्रेस के इस सख्त और विकेंद्रीकृत रुख से साफ है कि पार्टी अब दलबदल की संस्कृति पर लगाम लगाने के साथ-साथ स्थानीय संगठन और कार्यकर्ताओं की आवाज को सर्वोपरि रखना चाहती है। पहले जहां कई बार बड़े नेता केंद्रीय स्तर पर पैरवी करके आसानी से वापसी पा लेते थे, वहीं अब ‘जिला समन्वय समिति’ के इस सियासी इम्तिहान से गुजरना हर बागी नेता के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इससे उन नेताओं की सांसे अटक गई हैं जो चुनावी नफा-नुकसान देखकर दल बदलते रहे हैं।

