बांग्लादेश में गारमेंट वर्क‌र्स का उग्र प्रदर्शन, वेतन वृद्धि की मांग को लेकर सड़कों पर हिंसा

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नई दिल्ली। पड़ोसी देश बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले तैयार कपड़ा (RMG) उद्योग में वेतन को लेकर असंतोष एक बार फिर भीषण हिंसक टकराव में बदल गया है। रविवार को न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी की लंबे समय से चली आ रही मांग को लेकर हजारों कपड़ा कर्मचारियों ने राजधानी ढाका और उससे सटे प्रमुख औद्योगिक केंद्र गाजीपुर में बड़े पैमाने पर उग्र विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों के हिंसक रुख और मुख्य राजमार्गों के जाम होने के बाद बैकफुट पर आई बांग्लादेश सरकार ने आनन-फानन में कर्मचारियों के वेतन ढांचे की समीक्षा के लिए नया वेज बोर्ड गठित करने का आधिकारिक ऐलान कर दिया है।

पुलिस और प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, रविवार सुबह ढाका के मीरपुर और आसपास के इलाकों में हजारों की संख्या में कपड़ा मजदूर सड़कों पर उतर आए। नारेबाजी करते हुए उग्र भीड़ ने ढाका में पुलिस के एक गश्ती वाहन को आग के हवाले कर दिया और गाजीपुर स्थित एक पुलिस चौकी पर जमकर तोड़फोड़ करते हुए उसमें आग लगा दी।

आंदोलनकारियों ने ढाका-तंगैल राजमार्ग सहित कई प्रमुख सड़कों पर भारी बैरिकेडिंग कर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह ठप कर दी। इसके कारण कई घंटों तक यातायात व्यवस्था बाधित रही और आम नागरिकों व मालवाहक वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।सुरक्षा बलों की तैनाती: स्थिति पर काबू पाने और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस को आंसू गैस के गोले और साउंड ग्रेनेड का इस्तेमाल करना पड़ा। हालात बिगड़ते देख प्रभावित औद्योगिक क्षेत्रों में पुलिस के साथ बीजीबी की टुकड़ियों को भी तैनात कर दिया गया है।

प्रदर्शनकारी कर्मचारी अपने मौजूदा न्यूनतम वेतन (12,500 टका) को सीधे बढ़ाकर 30,000 टका प्रति माह करने की मांग पर अड़े हुए हैं। उनका कहना है कि आसमान छूती महंगाई के दौर में मौजूदा वेतन से गुजारा करना असंभव हो गया है।

बढ़ते उपद्रव को देखते हुए सरकार ने तुरंत ‘वेज बोर्ड’ के गठन की घोषणा की है, जो कर्मचारियों और मिल मालिकों के प्रतिनिधियों के साथ मिलकर नए वेतन पुनरीक्षण पर काम करेगा। इसके साथ ही सरकार ने सभी गारमेंट कर्मचारियों से शांति बनाए रखने और तुरंत काम पर लौटने की अपील की है।

बांग्लादेश का गारमेंट उद्योग देश के कुल निर्यात राजस्व में 80 प्रतिशत से अधिक का योगदान देता है और इसमें लगभग 40 लाख मजदूर कार्यरत हैं, जिनमें 60 से 70 प्रतिशत महिलाएं हैं। दूसरी ओर, फैक्ट्री मालिकों का तर्क है कि वैश्विक स्तर पर ऑर्डर कम मिलने और कच्चे माल की बढ़ती लागत के बीच मांग को तुरंत स्वीकार करना बेहद चुनौतीपूर्ण है। प्रदर्शनों के कारण सैकड़ों फैक्ट्रियों में कामकाज ठप हो गया है, जिससे वैश्विक ब्रांड्स को आपूर्ति में बाधा का खतरा मंडराने लगा है।

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