ब्रिक्स विस्तार से भारत को मिलेगा फायदा, ग्लोबल साउथ में बढ़ेगी पहुंच: रिपोर्ट

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नई दिल्ली। ब्रिक्स प्लस में भारत की भूमिका केवल नई दिल्ली शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस विस्तारित समूह ने भारत को ग्लोबल साउथ के देशों के साथ जुड़ने के लिए एक बड़ा मंच दिया है। हालांकि, इससे गठबंधन को साधने की चुनौती भी बढ़ गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत को अब यूएई समेत अन्य मध्यम ताकतवर देशों के साथ अपने संबंधों को और मजबूत करना होगा और नए सदस्यों के साथ तालमेल बैठाना होगा, ताकि लगातार हो रहे विस्तार से समूह की ताकत कमजोर न पड़े।

एक रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है, “ब्रिक्स अब वो छोटा पांच देशों का समूह नहीं रहा, जिसे भारत ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के तौर पर बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। विस्तार के बाद इसका भौगोलिक दायरा, जनसंख्या और आर्थिक वजन काफी बढ़ गया है और यह मौजूदा वैश्विक व्यवस्था से असंतुष्ट देशों की आवाज के तौर पर उभरा है, लेकिन इस विस्तार ने ऐसे समूह में और भी अंतर्विरोध ला दिए हैं, जो पहले से ही बहुत एकजुट नहीं था।”

हालांकि, रिपोर्ट ने यह भी माना कि विस्तार भारत के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। मूल ब्रिक्स ने नई दिल्ली को एक अलग पहचान दी थी, वहीं विस्तारित ब्रिक्स अब भारत को मध्य पूर्व, अफ्रीका, एशिया और पूरे ग्लोबल साउथ के अहम देशों के साथ रिश्ते गहरे करने का एक व्यापक मंच दे रहा है।

रिपोर्ट में जिक्र किया गया है, “ब्रिक्स प्लस भारत की पसंदीदा शब्दावली को और अधिक मजबूती दे सकता है: रणनीतिक स्वायत्तता, बहुध्रुवीयता, संप्रभु समानता, सुधरा हुआ बहुपक्षवाद और विकासशील देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। भारत को अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बदलने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता नहीं है। भारत को उस व्यवस्था के भीतर अपनी सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाने के लिए ब्रिक्स की आवश्यकता है।”

रिपोर्ट में आगे कहा गया, “विस्तारित समूह अंतरराष्ट्रीय संगठनों और अन्य संस्थानों में सुधार के लिए भारत के तर्क को मजबूत करता है, जिनकी संरचनाएं आर्थिक और जनसांख्यिकीय वास्तविकताओं को पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती हैं। यह विकास वित्तपोषण, जलवायु न्याय, प्रौद्योगिकी पहुंच, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, लचीली आपूर्ति श्रृंखलाओं और डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारत की ग्लोबल साउथ कूटनीति के लिए एक मंच भी प्रदान करता है।

रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली को ब्रिक्स प्लस को न तो अपने विदेश नीति के प्राथमिक मंच के रूप में देखना चाहिए और न ही एक असुविधाजनक विरासत वाले समूह के रूप में। इसके बजाय, इसे गुट की राजनीति को अपनाए बिना बहुध्रुवीयता को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से एक व्यापक रणनीति के एक स्तंभ के रूप में देखना चाहिए, जहां दिल्ली की अध्यक्षता भारत के राजनयिक नेतृत्व को प्रदर्शित कर सकती है, वहीं इसके बाद जो होगा वह उसकी कूटनीति की परीक्षा को दर्शाएगा।

रिपोर्ट में कहा गया, “केंद्रीय बिंदु यह नहीं है कि क्या ब्रिक्स प्लस पुराने ब्रिक्स से अधिक मजबूत है। केंद्रीय बिंदु यह है कि क्या भारत एक बड़े और अधिक विरोधाभासी समूह को एक बहुध्रुवीय व्यवस्था के पक्ष में काम करवा सकता है जो भारतीय स्वायत्तता को बनाए रखे।”

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