नई दिल्ली। इज़राइल के संसदीय चुनावों (नेसेट चुनाव) के त्रिशंकु और बेहद फंसे हुए नतीजों के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गुरुवार को सियासी पारा और चढ़ा दिया है। बहुमत के आंकड़े (61 सीटों) से दूर रहने और विपक्षी दलों से कड़ी चुनौती मिलने के बाद, नेतन्याहू ने अरब नेतृत्व वाले राजनीतिक दलों पर चुनावों में धांधली और धोखाधड़ी के गंभीर आरोप दोहराए हैं। इसके साथ ही उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में विदेशी हस्तक्षेप का संदेह जताते हुए देश की पुलिस और शीर्ष आंतरिक सुरक्षा एजेंसी (शिन बेत) से इस मामले की तत्काल और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
नेतन्याहू ने दावा किया है कि चुनाव के दौरान मतदान केंद्रों पर बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं और अरब दलों ने नियमों को ताक पर रखकर चुनावी नतीजों को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की।
प्रधानमंत्री ने आशंका जताई है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे कुछ बाहरी या विदेशी ताकतों का हाथ हो सकता है, जो इज़राइल की आंतरिक राजनीतिक स्थिरता को कमजोर करना चाहती हैं। उन्होंने सुरक्षा एजेंसियों को इसकी तह तक जाने के निर्देश देने की मांग की है।
एक तरफ जहां त्रिशंकु संसद में सरकार गठन के लिए हर एक सीट का महत्व है, वहीं नेतन्याहू ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी कीमत पर अरब नेतृत्व वाले दलों के समर्थन से सरकार नहीं बनाएंगे। उन्होंने वैचारिक रूप से उनके साथ किसी भी तरह के सहयोग या समर्थन को सिरे से खारिज कर दिया है।
हाल ही में संपन्न हुए 26वें नेसेट चुनावों में रिकॉर्ड 77.7 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था, लेकिन शुरुआती और अंतिम रुझानों में नेतन्याहू का दक्षिणपंथी गठबंधन 53 सीटों पर सिमटता दिख रहा है, जो बहुमत (61 सीटों) से काफी पीछे है।
दूसरी ओर, विपक्षी दल और अरब पार्टियां (जिन्होंने इस चुनाव में 19 सीटें जीती हैं) नेतन्याहू के इन आरोपों को उनकी राजनीतिक हार की बौखलाहट करार दे रही हैं। जैसे-जैसे देश में अगली सरकार के गठन को लेकर राष्ट्रपति इसाक हर्ज़ोग के साथ विचार-विमर्श का समय नजदीक आ रहा है, इज़राइल का यह सियासी संकट और अधिक गहराता जा रहा है।

