नई दिल्ली। पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने 2014 में पंजाब प्रांत के कसूर जिले में ईसाई दंपति शहजाद मसीह (26) और उनकी गर्भवती पत्नी शमा बीबी (24) को जिंदा जलाकर मार डालने के मामले में दोषी ठहराए गए अंतिम तीन आरोपियों को भी बरी कर दिया है। इसके साथ ही इस बहुचर्चित मामले में अब कोई भी व्यक्ति दोषी नहीं बचा है। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब सरकार की उस अपील को भी खारिज कर दिया, जिसमें पहले बरी किए गए 102 अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई थी। इस फैसले के बाद पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था और धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं।
यह दर्दनाक घटना 4 नवंबर 2014 को पंजाब के कसूर जिले में हुई थी। शहजाद मसीह और शमा बीबी एक ईंट-भट्ठे पर मजदूरी करते थे। उन पर कुरान के पन्ने जलाने का झूठा आरोप लगाया गया। रिपोर्टों के अनुसार, भट्ठा मालिक ने आर्थिक विवाद के चलते दोनों को वहां से भागने नहीं दिया। इसके बाद एक स्थानीय मौलवी ने मस्जिद के लाउडस्पीकर से लोगों को उकसाया। देखते ही देखते एक हजार से अधिक लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। भीड़ ने दोनों को बेरहमी से पीटा, यातनाएं दीं और फिर जलते हुए ईंट-भट्ठे की भट्टी में जिंदा फेंक दिया। उस समय शमा बीबी गर्भवती थीं।
घटना के बाद आतंकवाद निरोधक अदालत ने पांच आरोपियों को मौत की सजा और आठ अन्य को दो-दो साल की कैद सुनाई थी। लेकिन बाद के वर्षों में उच्च अदालतों ने साक्ष्यों की कमी का हवाला देते हुए अधिकांश आरोपियों को बरी कर दिया। साल 2018 में 20 और आरोपियों को राहत मिली। इसके बाद 10 जुलाई को पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम तीन दोषियों की मौत की सजा भी रद्द कर दी। अदालत ने कहा कि पुलिस द्वारा पर्याप्त और मजबूत साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
कैथोलिक सहायता संस्था Aid to the Church in Need (ACN) से बातचीत में पाकिस्तान कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष बिशप सैमसन शुकरदीन ने फैसले पर गहरा दुख जताया। उन्होंने कहा, “शहजाद और गर्भवती शमा को जिंदा आग में फेंक दिया गया था। 12 साल की कानूनी लड़ाई के बाद भी न्याय नहीं मिला। आखिर इंसाफ कहां है?” फैसलाबाद के बिशप इंद्रियास रहमत ने कहा कि पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा करने वालों को अक्सर सजा नहीं मिलती। उन्होंने आरोप लगाया कि शुरुआत में गिरफ्तारियां होती हैं, लेकिन बाद में कमजोर जांच और साक्ष्यों के अभाव में आरोपी छूट जाते हैं। बिशप रहमत ने अगस्त 2023 में पंजाब के जरानवाला में हुई हिंसा का भी जिक्र किया, जहां ईशनिंदा के आरोपों के बाद भीड़ ने 26 चर्चों और 80 से अधिक ईसाई घरों में आग लगा दी थी। हाल ही में इस मामले में भी एक आरोपी को 10 साल की सजा हुई, जबकि 12 अन्य आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया।
नेशनल कैथोलिक कमीशन फॉर जस्टिस एंड पीस (NCJP) ने आरोप लगाया कि पुलिस अक्सर मामलों की सही तरीके से जांच नहीं करती, जिसके कारण अदालतों में पर्याप्त साक्ष्य नहीं पहुंच पाते। बिशप शुकरदीन ने कहा कि कई पीड़ित परिवार न्याय की मांग करने से भी डरते हैं क्योंकि उन्हें बदले की कार्रवाई का भय रहता है। ईसाई नेताओं ने अमेरिका, यूरोप और अन्य लोकतांत्रिक देशों से पाकिस्तान पर धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए दबाव बनाने की अपील की है। उनका कहना है कि केवल औपचारिक बैठकों से हालात नहीं बदलेंगे, बल्कि जमीन पर न्याय सुनिश्चित करना जरूरी है।
मानवाधिकार संगठनों के अनुसार पाकिस्तान में ईशनिंदा के आरोप अक्सर भीड़ हिंसा का कारण बनते हैं। हाल के वर्षों में कई मामलों में आरोपियों को अदालत तक पहुंचने से पहले ही भीड़ ने मार डाला। मानवाधिकार आयोग पाकिस्तान (HRCP) और इंटरनेशनल फेडरेशन फॉर ह्यूमन राइट्स (FIDH) भी पाकिस्तान की न्याय व्यवस्था में भ्रष्टाचार, कमजोर जांच और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव को लेकर लगातार चिंता जता चुके हैं।

