नई दिल्ली। पूर्वी सऊदी अरब के दम्माम शहर में स्थित किंग फ़हद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के करीब एक मिसाइल गिरने से क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है। सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य गठबंधन के अनुसार, यमन के हूती विद्रोहियों द्वारा नागरिक ठिकानों और हवाई अड्डों पर लगातार हमले किए जा रहे हैं। इससे पहले राजधानी रियाद के किंग ख़ालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे को भी निशाना बनाया गया था।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने सऊदी अरब में असैनिक बुनियादी ढांचों और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर हो रहे इन हमलों की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है। भारत ने स्पष्ट किया कि निर्दोष नागरिकों और नागरिक सुविधाओं को निशाना बनाना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है और इसे तत्काल बंद किया जाना चाहिए। भारत ने हमले में मारे गए लोगों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए घायलों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना की है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने हमले की निंदा तो की, लेकिन सैन्य मदद से कदम पीछे खींच लिए हैं। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हाल ही में ‘मक्का समझौता’ हुआ था, जिसके तहत किसी भी एक देश पर हमला सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है। हालांकि, पाकिस्तानी अधिकारियों का तर्क है कि यमन का संघर्ष इस समझौते के अस्तित्व में आने से पहले से चला आ रहा है, इसलिए वे इस युद्ध में सीधे शामिल होने के लिए बाध्य नहीं हैं।
अरबों डॉलर के आधुनिक सैन्य हथियार और विशाल भंडार होने के बावजूद सऊदी अरब का सुरक्षा तंत्र हूती मिसाइलों और ड्रोन हमलों को पूरी तरह से रोकने में असमर्थ दिख रहा है। रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार:
तुर्की और पाकिस्तान भी इस बात से चिंतित हैं कि सीधे हस्तक्षेप से ईरान और उसके सहयोगी सशस्त्र संगठन उन पर भी जवाबी हमला कर सकते हैं।
सैन्य विशेषज्ञों और वॉशिंगटन स्थित जोखिम सलाहकारों का मानना है कि हूती विद्रोहियों के बढ़ते दुस्साहस के कारण सऊदी अरब के पास अब बेहद सीमित और कठिन विकल्प बचे हैं। यमन में फिर से बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई करने का दबाव बढ़ रहा है, हालांकि इसके लिए सऊदी अरब को आर्थिक और रणनीतिक रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

