पाकिस्तान: निजी स्कूलों ने तोड़ा कमजोर तबके से किया वादा, स्कॉलरशिप कोटे की धज्जियां उड़ाईं

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नई दिल्ली। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के प्राइवेट स्कूल आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों स्टूडेंट्स के लिए 10 प्रतिशत स्कॉलरशिप कोटा को नजरअंदाज कर रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर इस्लामाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया है। याचिका के अनुसार ये देश में बने ‘ निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार एक्ट, 2012’ के तहत जरूरी है।

एक रिपोर्ट में विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया कि ये शैक्षिक संस्थान कानून तोड़कर हर साल पांच अरब से छह अरब पाकिस्तानी रुपये (पीकेआर) कमाते हैं।

पाकिस्तान के जाने-माने अखबार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून के एक संपादकीय में स्कूलों की मनमानी की पूरी दास्तां है। इसमें बताया गया है कि सोच ये थी कि स्कूलों में स्कॉलरशिप कोटा शुरू करने से कमजोर तबकों के मेधावी छात्रों को फायदा होगा और उनकी आने वाली जिंदगी बेहतर होगी।

सम्पादकीय के अनुसार, “एक अंदाजा है कि अब तक कम से कम 38,900 छात्र इस अधिकार से वंचित रह गए। (तंज कसा) अगर इन प्राइवेट संस्थाओं के खिलाफ कानूनी कार्रवाई इसी रफ्तार से जारी रही, तो यह संख्या जरूर बढ़ेगी। इसके अलावा, सिर्फ स्कॉलरशिप कोटा इस नुकसान को ठीक करने के लिए काफी नहीं होगा। इन प्राइवेट संस्थानों को गैर-कानूनी तरीके से कमाए गए हर पैसे को वापस करने के लिए मजबूर किया जाना चाहिए, और उन छात्रों को मुआवजा दिया जाना चाहिए जिन्होंने जिंदगी बदलने वाले शैक्षिक मौकों को गंवा दिया।”

पिछले महीने, एक रिपोर्ट ने दयनीय शैक्षिक व्यवस्था की पोल खोली थी। इससे पता चला कि पाकिस्तान में 5-16 साल की उम्र के लगभग 28 प्रतिशत बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। चिंता की बात यह है कि लड़कियों की संख्या ज्यादा है। 22 फीसदी लड़कों के मुकाबले 34 फीसदी लड़कियां स्कूल नहीं जा पाती हैं। ये पाकिस्तान के ग्रामीण इलाकों में अधिक देखा जाता है। वहां लैंगिक असमानता स्पष्ट दिखती है।

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने गैलप पाकिस्तान के एचआईईएस सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि 10 साल और उससे ज्यादा उम्र के दो-तिहाई पाकिस्तानी कभी न कभी स्कूल गए हैं लेकिन शिक्षा का स्तर असमान रहा है। पाकिस्तान की राष्ट्रीय साक्षरता दर 63 फीसदी है, जिसमें पुरुषों की साक्षरता दर 73 फीसदी और महिलाओं की 52 फीसदी है।

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